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| मुझे गर्व है तुम पर |
एक पिता ने एक प्रतियोगिता में अपनी बेटी के साथ अपने रिश्ते के बारे में लिखा- "मेरी बेटी के साथ मेरा रिश्ता मुझे हमेशा आश्चर्यचकित कारता है। यह वास्तविकता मुझे दिन में कई बार अभिभूत कर जाती है कि मैं एक बेटी का पिता हूँ। इस खुशी को व्यक्त करना नामुमकिन है। कोई शब्द बना ही नहीं, खोजा ही नहीं गया। यह पूरी तरह मौलिक है, इसे किसी शब्द की जरूरत ही नहीं है। उसकी आँखों में मैं अपनी कमियों का पूर्ण पाता हूँ। उसके लिए मैं दुनिया का ऐसा इंसान हूँ जिसमें कोई खामी नहीं है। मैं उसका डैड हूँ, उसके लिए सुपरमैन से भी ज्यादा ताकतवर। उसकी आँखों में मैं अपनी माँ को देखता हूँ, अपनी बहन को पाता हूँ, यहाँ तक कि मेरी कुछ पुरानी शिक्षिकाएं भी उस वक्त उसमें साकार हो जाती हैं, जब वह कहती है, अरे! डैडी आपको तो कुछ भी नहीं मालूम। उसकी आँखों में मैं उन महिलाओं को देख पाता हूँ, जिन्हें मैंने अपने पिछले जीवन में किसी न •िसी तरह दुख पहुंचाया। अपनी बेटी के सहारे मैं उन सब से माफी मांगना चाहता हूँ। उन तमाम शब्दों के लिए जिसने उनका दिल दुखाया और उन तमाम हरकतों के लिए जिनसे उन्हें चोट पहुंची। अपनी बेटी की आँखों में मैं उस स्त्री की छवि देखता हूँ जिसके साथ मैं एक सुखद भविष्य गुजार रहा हूँ, उसकी माँ। मैंने दुनिया को आगे बढ़ाने के लिए उसकी अगली पीढ़ी दी है। मैं खुश हूँ कि मैं दुनिया को इतनी खूबसूरती सौंप रहा हूँ। मुझे गर्व है कि मैंने सृजन किया है और सबसे ज्यादा गर्व है कि मैं एक बेटी का पिता हूँ।"
कितने इत्मिनान से वो ठुकरा गया मुझे
आंसू बना के आँख से टपका गया मुझे
कैसी ये रहबरी थी ये कैसा फरेब था
मंज़िल दिखा के राह से भटका गया मुझे
खामोश निगाहों से कहानी सुना गया
लफ़्ज़ों की हेर-फेर में अटका गया मुझे
मुझको भी बचपने का एक मज़ाक समझकर
छोटी सी एक हंसी में ही उड़ा गया मुझे
दो दिन में उसके दिल से मोहब्बत उतर गई
और दो ही दिन में याद से मिटा गया मुझे
नकाब ओढ़कर महज नकाब जिंदगी हुई
यूँ आपसे मिली कि बस खराब जिंदगी हुई
मुझे निकाल क्या दिया जनाब ने खयाल से
पड़ी हो जैसे शैल्फ पर किताब जिंदगी हुई
गुनाह में थी साथ वो तेरे सखी रही सदा
नकार तूने क्या दिया सवाब जिंदगी हुई
वो सादगी, वो बाँकपन गया कहाँ तेरा बता
जो कल तलक थी आम,क्यों नवाब जिंदगी हुई
हकीकतों से क्या हुई मेरी थी दुश्मनी भला
खुदी को भूलकर फ़कत थी ख्वाब जिंदगी हुई
तेरे खयाल में रही छुई-मुई वो गुम सदा
भुला दिया यूँ तुमने तो अजाब जिन्दगी हुई
फुहार क्या मिली तुम्हारे नेह की भला हमें
रही न खार दोस्तो गुलाब जिन्दगी हुई
खुमारी आपकी चढ़ी कहूँ भला क्या दोस्तो
बचाई मैंने खूब पर शराब जिंदगी हुई
बही में वक्त की लिखा गया क्या नाम ‘श्याम’ का
गजल रही न गीत ही कि ख्वाब जिंदगी हुई
यूँ आपसे मिली कि बस खराब जिंदगी हुई
मुझे निकाल क्या दिया जनाब ने खयाल से
पड़ी हो जैसे शैल्फ पर किताब जिंदगी हुई
गुनाह में थी साथ वो तेरे सखी रही सदा
नकार तूने क्या दिया सवाब जिंदगी हुई
वो सादगी, वो बाँकपन गया कहाँ तेरा बता
जो कल तलक थी आम,क्यों नवाब जिंदगी हुई
हकीकतों से क्या हुई मेरी थी दुश्मनी भला
खुदी को भूलकर फ़कत थी ख्वाब जिंदगी हुई
तेरे खयाल में रही छुई-मुई वो गुम सदा
भुला दिया यूँ तुमने तो अजाब जिन्दगी हुई
फुहार क्या मिली तुम्हारे नेह की भला हमें
रही न खार दोस्तो गुलाब जिन्दगी हुई
खुमारी आपकी चढ़ी कहूँ भला क्या दोस्तो
बचाई मैंने खूब पर शराब जिंदगी हुई
बही में वक्त की लिखा गया क्या नाम ‘श्याम’ का
गजल रही न गीत ही कि ख्वाब जिंदगी हुई
तुम जो हँसते हो तो फूलों की अदा लगते हो
और चलते हो तो एक बाद-ऐ-सबा लगते हो
कुछ न कहना मेरे कंधे पे झुकाकर सिर को
कितने मासूम हो तस्वीर-ऐ-वफ़ा लगते हो
बात करते हो तो सागर से खनक जाते हो
लहर का गीत हो कोयल की सदा लगते हो
किस तरफ जाओगे जुल्फों के ये बदल लेकर
आज मछली हुई सावन की घटा लगते हो
तुम जिसे देख लो पीने की ज़रूरत क्या है
ज़िंदगी भर जो रहे ऐसा नशा लगते हो
मैंने महसूस किया तुमसे जो बातें कर के
तुम ज़माने में ज़माने से जुदा लगते हो
और चलते हो तो एक बाद-ऐ-सबा लगते हो
कुछ न कहना मेरे कंधे पे झुकाकर सिर को
कितने मासूम हो तस्वीर-ऐ-वफ़ा लगते हो
बात करते हो तो सागर से खनक जाते हो
लहर का गीत हो कोयल की सदा लगते हो
किस तरफ जाओगे जुल्फों के ये बदल लेकर
आज मछली हुई सावन की घटा लगते हो
तुम जिसे देख लो पीने की ज़रूरत क्या है
ज़िंदगी भर जो रहे ऐसा नशा लगते हो
मैंने महसूस किया तुमसे जो बातें कर के
तुम ज़माने में ज़माने से जुदा लगते हो
मोहब्बत खुद बताती है
कहाँ किसका ठिकाना है
किसे आँखों में रखना है
किसे दिल में बसाना है
रिहा करना है किसको और
किसे ज़ंजीर करना है
मिटाना है किसे दिल से
किसे तहरीर करना है
इसे मालूम होता है
सफ़र दुश्वार कितना है
किसी की चश्म-ऐ-गैरां में
छिपा इक़रार कितना है
शज़र जो गिरने वाला है
वो सायादार कितना है
कहाँ किसका ठिकाना है
किसे आँखों में रखना है
किसे दिल में बसाना है
रिहा करना है किसको और
किसे ज़ंजीर करना है
मिटाना है किसे दिल से
किसे तहरीर करना है
इसे मालूम होता है
सफ़र दुश्वार कितना है
किसी की चश्म-ऐ-गैरां में
छिपा इक़रार कितना है
शज़र जो गिरने वाला है
वो सायादार कितना है
ऐसा लगता है उसने मुझे कुछ यूं दुआ दी है
जैसे काँटों में खुदा ने फूलों को पनाह दी है
यूं आवाज़ दी थी उसने बिछड़ते वक़्त मुझे
सहरा में जैसे किसी मुसाफिर ने सदा दी है
देखकर क़िस्मत को ये लगता है अब मुझे
मुक़द्दर ने जैसे मुझको बेवज़ह सजा दी है
ग़लत है दुनिया में अगर किसी को चाहना यारों
तो जिंदगी में हमने बहुत बड़ी ख़ता की है
लौटना मुमकिन नहीं मेरा अब यहाँ से कभी
किसी की ख़ातिर मैंने अपनी हस्ती लुटा दी है
जैसे काँटों में खुदा ने फूलों को पनाह दी है
यूं आवाज़ दी थी उसने बिछड़ते वक़्त मुझे
सहरा में जैसे किसी मुसाफिर ने सदा दी है
देखकर क़िस्मत को ये लगता है अब मुझे
मुक़द्दर ने जैसे मुझको बेवज़ह सजा दी है
ग़लत है दुनिया में अगर किसी को चाहना यारों
तो जिंदगी में हमने बहुत बड़ी ख़ता की है
लौटना मुमकिन नहीं मेरा अब यहाँ से कभी
किसी की ख़ातिर मैंने अपनी हस्ती लुटा दी है
मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा
ये दुनिया बेवफा है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर कोई अपना रास्ता लेगा
मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चिराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा
कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो टूटा दिल है वो बदला किसी से क्या लेगा
मैं लाख करता रहूँ उसे याद दिन को रातों को
मैं जनता हूँ वो जब चाहेगा मुझे भुला देगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा
ये दुनिया बेवफा है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर कोई अपना रास्ता लेगा
मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चिराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा
कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो टूटा दिल है वो बदला किसी से क्या लेगा
मैं लाख करता रहूँ उसे याद दिन को रातों को
मैं जनता हूँ वो जब चाहेगा मुझे भुला देगा
तेरे फिराक़ के लम्हे शुमार करते हुए
बिखर गए हैं तेरा इंतज़ार करते हुए
तो मैं भी खुश हूँ कोई उससे जाके कहदे
अगर वो खुश है मुझे बेक़रार करते हुए
मैं मुस्कराता हुआ आईने में उभर आऊंगा
तू रो पड़ेगी अचानक श्रृंगार करते हुए
तुम्हें खबर ही नहीं कोई कैसे टूट गया
मोहब्बत का बेशुमार इक़रार करते हुए
वो कहती थी समन्दर नहीं हैं आँखें हैं
मैं उनमें डूब गया ऐतबार करते हुए
मुझे खबर थी कि अब लौटकर न आओगे
पर तुझको याद किया दर को पार करते हुए
बिखर गए हैं तेरा इंतज़ार करते हुए
तो मैं भी खुश हूँ कोई उससे जाके कहदे
अगर वो खुश है मुझे बेक़रार करते हुए
मैं मुस्कराता हुआ आईने में उभर आऊंगा
तू रो पड़ेगी अचानक श्रृंगार करते हुए
तुम्हें खबर ही नहीं कोई कैसे टूट गया
मोहब्बत का बेशुमार इक़रार करते हुए
वो कहती थी समन्दर नहीं हैं आँखें हैं
मैं उनमें डूब गया ऐतबार करते हुए
मुझे खबर थी कि अब लौटकर न आओगे
पर तुझको याद किया दर को पार करते हुए
तुझ सी सूरत नहीं मिलती है मुझे लाखों में
आजकल नींद नहीं आती है मुझे रातों में
वही दीवार वही दर है वही चौखट है
पर नहीं कोई खड़ा पानी लिए हाथों में
चाँद तारे नहीं अब और न परियों का हुजूम
मुख़्तसर लोरी नहीं गाता कोई अब रातों में
दिन गुज़र जाता है इस भीड़ में तन्हां-तन्हां
अश्क़ होते हैं भरी आँख बातों-बातों में
देर से आने पर अब कौन नसीहत देगा
कौन दे हौसला मुश्किल भरे हालातों में
तर्ज़ुमानी मैं तेरे प्यार की कैसे कर दूं
तू मुश्किल है ढल पाना मेरे खयालातों में
क़तरा-क़तरा है लहू मेरा तेरे कर्ज़े में
तेरा मुजरिम हूँ खड़ा हाथ लिए हाथों में
रंज इस बात का जीने नहीं देता मुझको
कुछ कमी रह गई थी मेरे ही ज़ज्बातों में
अब चली आ या बुला ले मुझे भी पास तेरे
मेरा दिल भर गया रिश्तों की ख़ुराफातों से
आजकल नींद नहीं आती है मुझे रातों में
वही दीवार वही दर है वही चौखट है
पर नहीं कोई खड़ा पानी लिए हाथों में
चाँद तारे नहीं अब और न परियों का हुजूम
मुख़्तसर लोरी नहीं गाता कोई अब रातों में
दिन गुज़र जाता है इस भीड़ में तन्हां-तन्हां
अश्क़ होते हैं भरी आँख बातों-बातों में
देर से आने पर अब कौन नसीहत देगा
कौन दे हौसला मुश्किल भरे हालातों में
तर्ज़ुमानी मैं तेरे प्यार की कैसे कर दूं
तू मुश्किल है ढल पाना मेरे खयालातों में
क़तरा-क़तरा है लहू मेरा तेरे कर्ज़े में
तेरा मुजरिम हूँ खड़ा हाथ लिए हाथों में
रंज इस बात का जीने नहीं देता मुझको
कुछ कमी रह गई थी मेरे ही ज़ज्बातों में
अब चली आ या बुला ले मुझे भी पास तेरे
मेरा दिल भर गया रिश्तों की ख़ुराफातों से
नाम पर रब के फ़क़त पैसा कमाना हो गया
ज़हन मुल्ला पंडितों का ताजराना हो गया
अब मुझे शुद्धीकरण की कोई इच्छा ही नहीं
आंसुओं में डूबना गंगा नहाना हो गया
क्या खबर अब पीपल-ओ-तुलसी का कैसा हाल हो
गांव को छोड़े हुए तो इक ज़माना हो गया
आज तक दिल से गई कब गांव की माटी की गंध
मुझको रहते इस शहर में इक ज़माना हो गया
क्या ज़माना था मगर अब क्या ज़माना हो गया
आदमी तो बे हिसी का इक ठिकाना हो गया
ज़िंदगी से मेरा रिश्ता जब पुराना हो गया
तब नए रिश्तों का घर में आना-जाना हो गया
इस से बढ़कर और क्या होगा मुहब्बत का सबूत
ज़हन मुल्ला पंडितों का ताजराना हो गया
अब मुझे शुद्धीकरण की कोई इच्छा ही नहीं
आंसुओं में डूबना गंगा नहाना हो गया
क्या खबर अब पीपल-ओ-तुलसी का कैसा हाल हो
गांव को छोड़े हुए तो इक ज़माना हो गया
आज तक दिल से गई कब गांव की माटी की गंध
मुझको रहते इस शहर में इक ज़माना हो गया
क्या ज़माना था मगर अब क्या ज़माना हो गया
आदमी तो बे हिसी का इक ठिकाना हो गया
ज़िंदगी से मेरा रिश्ता जब पुराना हो गया
तब नए रिश्तों का घर में आना-जाना हो गया
इस से बढ़कर और क्या होगा मुहब्बत का सबूत
रात को तूने कहा दिन मैंने माना हो गया
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