उन अंधेरों की वज़ह मत पूछो
जिन अंधेरों ने लूट लिया घर मेरा,
तब तो उठते नहीं थे हाथ मेरे
अब तो झुकने लगा है सर मेरा!
कभी मैं एक भला इंसान भी था
अब तो सबको लगा है डर मेरा
जो कभी दिल अजीज थे मेरे
अब ढूंढ़ते फिरने लगे हैं घर मेरा
कभी कहते थे देखो जनाब आ गए
अब किसी को नहीं रहा कदर मेरा!!

-राम कृष्ण गौतम "राम"



6 प्रतिक्रियाएँ:

shishirthakur167 ने कहा…

Truely Nice... Good Going... Well Done...

My World ने कहा…

Achchha Likhte ho yaar! Likhte raho... Abhi to hamen ek nai history likhni hai...

gyanadhurahai ने कहा…

Do line aur umra bhar ki baat... Kya baat hai... mAza aa gaya...

ज्ञान प्रताप सिंह ने कहा…

Hmmm! Nice Writing... Good Luck...

बूझो तो जानें ने कहा…

brillint poetry boss.

संजय भास्कर ने कहा…

कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

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