तेरी खुशी के लिए हमने गम उधार लिए
जाने कितनी बार तेरी खातिर लुटा बहार दिए

तुझे रोशनी देने को जलाया दिल अपना
तेरी सलामती को खुद ही जां निसार किए


हर सांस रखा तेरे कदमों के नीचे
चिलमन हटाकर छिप-छिपके तेरे दीदार किए

नजर न आई तुझे इश्क इस दीवाने की
तूने कितनी बार इस मासूम के शिकार किए



राम कृष्ण गौतम "राम"

5 प्रतिक्रियाएँ:

क्रिएटिव मंच-Creative Manch ने कहा…

तुझे रोशनी देने को जलाया दिल अपना
तेरी सलामती को खुद ही जां निसार किए


आह ~~~~
बहुत खूब ...... क्या बात है
महफ़िल लूट ली आपने
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आभार

ज्ञान प्रताप सिंह ने कहा…

तुझे रोशनी देने को जलाया दिल अपना
तेरी सलामती को खुद ही जां निसार किए

बहुत खूब

shishirthakur167 ने कहा…

Ghazab ki poetry hai... Bahut sundar!

My World ने कहा…

Badhia. kamal ki lines hain.

बूझो तो जानें ने कहा…

गजब, गजब,गजब......
राम भाई, आप तो छा गए.बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना.

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