तनहाइयों को अपना मुकद्दर बना लिया
रुसवाइयों के साए में अपना घर बना लिया

सदियों से घुप अंधेरा पसरा रहा यहां
कुछ न मिला इन्हीं को सहर बना लिया

यूं तो नहीं है कोई दीवारो दर मेरा
पत्थर के झोपड़े को ही शहर बना लिया

कांटे बिछे हैं मेरे घर से तेरे घर तक
कंटीले रास्तों को फिर डगर बना लिया

कहते हैं "राम" जन्मा है बस गमों के लिए
इस कहासुनी को मैंने अमर बना लिया

12 प्रतिक्रियाएँ:

अल्पना वर्मा ने कहा…

सदियों से घुप अंधेरा पसरा रहा यहां
कुछ न मिला इन्हीं को सहर बना लिया
bahut achchha likha hai.
bhaavpurn!

मनोज कुमार ने कहा…

यूं तो नहीं है कोई दीवारो दर मेरा
पत्थर के झोपड़े को ही शहर बना लिया
ग़ज़ल दिल को छू गई।
बेहद पसंद आई।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

कांटे बिछे हैं मेरे घर से तेरे घर तक
कंटीले रास्तों को फिर डगर बना लिया

बहुत ही सुंदर.

रामराम.

dontluvever ने कहा…

Bahut badhia kavita hai Gautam Bhai. Achchha likhte ho. Likhte raho. hamari shubh kaamnayen aapke saath hain. kabhi mere ghar bhi aaiye:
www.dontluvever.blogspot.com

REGARDS
DONTLOVE

शहर से उठ गई रश्म-ऐ-मोहब्बत... ने कहा…

Bhavnaen to sabki hoti hain, lekin vyakt bahut kam log kar paate hain, aapne apni bhavnaaon ko behtari se sanjoya hai aur vyakt kia hai. badhai.

शुभम जैन ने कहा…

bhaavpuran sundar rachna...

shishirthakur167 ने कहा…

कहते हैं "राम" जन्मा है बस गमों के लिए
इस कहासुनी को मैंने अमर बना लिया..



Very True Lines Dude. Better Done.

My World ने कहा…

तनहाइयों को अपना मुकद्दर बना लिया
रुसवाइयों के साए में अपना घर बना लिया



ग़ज़ल दिल को छू गई।
बेहद पसंद आई।

gyanadhurahai ने कहा…

Coaching doge bhai?


Bahut Sundar likha hai Brother, Achchhi Rachna hai.

ज्ञान प्रताप सिंह ने कहा…

Tumne likh rakha hai "आपकी दस्तक हौसला देगी मुझे!"

Ab ham kya hausla denge bhai? Hausal to tum ham logon ko de rahe ho, Itni achchhi rachnaayen likh kar. Congrates Dost.

EKTA ने कहा…

sunder rachna...

संजय भास्कर ने कहा…

ग़ज़ल दिल को छू गई।
बेहद पसंद आई।

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