गंगा... मां कहें या देवी...। दोनों का मतलब एक है। दोनों में एकरूपता है। आपने, मैंने और सबने, जबसे आंखें खोली हैं देखने के लिए और जबसे बोलने के लिए मुंह के अंदर जुबान हिलाया है... इसे मां के रूप में जाना है और देवी के रूप में माना है।

सदियों से गंगा एक पवित्र जलधारा मानी जाती रही है और आज भी इसका दर्जा काफी ऊंचा है। उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद नगर की शान और पूरे भारतवर्ष की जान है गंगा...। हिंदू मान्यता के मुताबिक देह का त्याग कर स्वर्गवासी हो जाने वाले प्राणी की अस्थियों को गंगा की पवित्र जलधारा में विसर्जित करने से उस प्राणी की आत्मा को मुक्ति मिलती है। इसके तटों पर ब्राह्मण को दान देने और भूखे लोगों को भोजन कराने का अपना एक अलग महत्व है।


पुरातन काल से चली आ रही गंगा की महानता और इसकी दिव्यता सर्वविदित है। पुराणों में वर्णित है कि मां गंगा को आदिदेव शिव ने अपनी शिखा (सिर के मध्यभाग) में धारण किया था और भागीरथ की तपस्या व अनुग्रह पर इसे पृथ्वी पर अवतरित होने का आदेश दिया था। तब से लेकर आज तक मां गंगा शिव के आदेश का पालन करती हुईं अपना कर्तव्य निभा रही हैं और सकल प्राणिजगत का कल्याण कर रही हैं। सदियां गुजर गईं लेकिन गंगे मां अपने कर्तव्य से विमख नहीं हुईं।
वर्तमान में उसी मां की हालत ठीक वैसी ही है जैसे हजारों पुत्र होने के बाद घर से बेदखल माता की होती है। एक ओर तो गंगा को मां कहकर उसकी आराधना की जाती है और दूसरी ओर उसी आराधना से बचे कूड़े-करकट को बेझिझक मां के आंचल में डाल दिया जाता है। कैसी भक्ति है यह...। यह कैसी आराधना है। जहां सिर्फ दिखावा ही दिखावा है। धर्म और पूजा के नाम पर इसका कितनी बेदर्दी से क्षरण किया जा रहा है यह किसी से नहीं छिपा है
1968 में रिलीज फिल्म सुहागरात का एक गीत लता मंगेशकर जी की आवाज में सुनाई देता है कि 'गंगा मैया में जब तक कि पानी रहे, मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे!' इस गीत में एक पतिव्रता नारी अपने पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती है और मां गंगे की अविरल धारा से अपने पति की आयु की तुलना करती है।

उस वक्त शायद मां गंगा की ये दशा न थी। इसीलिए यह गीत लिखा गया और संगीतबद्ध कर इसे स्वर साम्राज्ञी की आवाज दी गई। लता जी भी जब आज यह गीत खुद सुनती होंगी तो उनकी आंखें एक न एक बार तो नम जरूर होती होंगी। वो भी सोचती होंगी कि जिसे हम मां कहते हैं, जिसकी हम पूजा करते हैं उसी की दशा चिंतनीय हो गई है।

अगर गंगा का इसी तरह बेदर्दी से क्षरण होता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब अपने पति की लंबी आयु के लिए किसी पतिव्रता नारी को कोई दूसरा गीत सोचना होगा और हमारी मां गंगा के अस्थि विसर्जन के लिए उन्हीं का पवित्र जल नसीब नहीं होगा।

2 प्रतिक्रियाएँ:

Suman ने कहा…

nice

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सटीक चिंतन किया है आपने. हमारे देश में नदियों को पूजा के नाम पर भी प्रदूषित किया जाता है.

रामराम.

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