दुआ दो हमें भी ठिकाना मिले
परिंदों को भी आशियाना मिले

तबियत से मिलें मुझे मेरे दोस्त
मेरे दोस्तों से ज़माना मिले

तरसता हूँ नन्हें से लब की तरह
तबस्सुम का कोई बहाना मिले

चला हूँ सफ़र में, मैं ये सोच के
कोई मीत बिछड़ा पुराना मिले

अभी तो लगी है झड़ी ही झड़ी
कभी कोई मौसम सुहाना मिले

'किशन' मैं हूँ आशिक़ ज़रा दूसरा
मुझे काश कोई दीवाना मिले




7 प्रतिक्रियाएँ:

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

kshama ने कहा…

तरसता हूँ नन्हें से लब की तरह
तबस्सुम का कोई बहाना मिले

चला हूँ सफ़र में, मैं ये सोच के
कोई मीत बिछड़ा पुराना मिले
Behad sundar rachana!

शुभम जैन ने कहा…

bahut sundar rachna...

[nanhi pari ko bhoole to nahi hai na gutam uncle]

Ram Krishna Gautam ने कहा…

अरे नहीं शुभम जी, नन्हीं परी को नहीं भूल सकता... भूलने का सवाल ही नहीं...

I still remember my sweetheart...


"रामकृष्ण"

ज्ञान प्रताप सिंह ने कहा…

Itna bizi hone ke baad bhi tum itna time kaise de dete ho yaar. Bahut badhia likha hai. kasam se padhkar maza aa gaya. likhte raho.

शहर से उठ गई रश्म-ऐ-मोहब्बत... ने कहा…

Well Done! Achchha likha hai.




Apka

DONTLUV

Juhi ने कहा…

I came first time across ur blog. i read ur poetris and wondered that how can anyone can arrange the words very beautifully like this. i really surprized after viewing this creation.




JUHI

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