बदला न अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम
थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे

गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे

निदा फ़ाज़ली

3 प्रतिक्रियाएँ:

kshama ने कहा…

गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे
Kya gazab dua hai!Rachna padh,dang rah gayi!

ज्ञान प्रताप सिंह ने कहा…

Maza Aa Gaya... Sateek..

ज्ञान प्रताप सिंह ने कहा…

Thodi Bahut to zehan me narazgi rahe... Kya baat hai!

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