जैसे अनन्त पतझड़ के बाद
पहला-पहला फूल खिला हो

और किसी निर्जल पहाड़ से

फूट पड़ा हो कोई झरना

जैसे वसुंधरा आलोकित करता

सूरज उदित हुआ हो
चीड़ वनों में गूँज उठा हो
चिड़ियों का कलरव
जैसे चमक उठा हो इंद्रधनुष

अम्बर को सतरंगी करता

और किसी अनजान
गंध से
महक उठी हो
जैसे कोई ढलती सांझ
ऐसे आई हो
तुम मेरे जीवन मे
सागर की उत्तुँग
लहरों पर सवार

जैसे तटों तक पहुँचती है
हवा
गहन वन में
चलते-चलते
जैसे
दिख जाए कोई ताल

सदियों से सूखे दरख्त पर

जैसे आ जायें फिर से पत्ते

पतझर से ऊबे पलाश में
जैसे आता है वसंत
फूल बनकर
ऐसे आई हो
तुम मेरे जीवन में
आओ तुम्हारा स्वागत है।


"गर्ल चाइल्ड डे (24 सितम्बर)" पर रचनाकार: मुकेश मानस की एक कविता|

5 प्रतिक्रियाएँ:

संजय भास्कर ने कहा…

कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

संजय भास्कर ने कहा…

मैं क्या बोलूँ अब....अपने निःशब्द कर दिया है..... बहुत ही सुंदर कविता.......

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत खूब!!

kshama ने कहा…

Jab bhi koyi pita apni betika is duniyame is tarah se swagat karta hai to mera man bhar aata hai!

उपेन्द्र " the invincible warrior " ने कहा…

manas ji ki ais kavita ne man moh liya........

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