"कहाँ तो तय था चरागा हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है
लो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए"


दुष्यंत जी की इन पंक्तियों को मैंने अपनी आँखों से चरितार्थ होते देखा है। मिट्टी की सुगंध और उसका रंग लिए खाकी वर्दी... जिस पर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी है, अगर वही हमारे लिए दुःख का कारण बन जाए तो हम अपनी फ़रियाद लेकर कहाँ जाएं... एक किस्सा प्रस्तुत करना चाहूँगा - "एक बार भगवान् श्रीराम जी के पैरों के नीचे एक गिलहरी दब गई... उसे बेहद कष्ट हुआ लेकिन उसने उफ़ भी नहीं की... बाद में श्रीराम की नज़र उस पर पड़ी और उन्होंने गिलहरी से पूछा - जब तुम्हें इतना कष्ट हुआ तो तुमने मुझसे कहा क्यों नहीं? गिलहरी ने उत्तर दिया - प्रभु! जब भी मुझे कुछ कष्ट होता था तो मैं "राम" का नाम लेती थी, आज तो मुझे स्वयं "राम" ने कष्ट दिया, तब मैं किसका नाम लेती?"

ऐसी ही कुछ अपेक्षाएं हम अपने रक्षकों यानि पुलिस से करते हैं कि यदि कोई हमें परेशान करता है, प्रताड़ित करता है या हमारे लिए कोई भी समस्या उत्पन्न करता है तो "सत्यमेव जयते" के ये पुजारी (तथाकथित) हमारी रक्षा करेंगे और तमाम आपदाओं से हमें महफूज़ रखेंगे पर उस घडी क़ी कल्पना कीजिए जब ये रक्षक ही हमारे शोषण और हमारी विपत्ति का कारण बन जाते हैं तब हम किसे हम अपनी परेशानी बताएँगे? जब थाने में ही हमारी पुकार नहीं सुनी जाएगी तो हम कहाँ जाकर 'एफआईआर' दर्ज़ करेंगे? जब ये लोग ही 'जुगाड़' और 'पहुँच' क़ी गिरफ्त में क़ैद होकर अपनी 'खाकी' को 'खाक' में मिलाने का रास्ता पकड़ेंगे तो भारत माता क़ी आबरू कब तक आँचल क़ी दरख़्त में रह पाएगी? ऐसे ही अनेकों विडंबनाएं हैं इस तंत्र क़ी, जिसके चलते आम आदमी खुद पर झूठा गर्व करता है यकीन नहीं होता कि "खाकी" पहनने के बाद एक 'हाड़-मांस' का लोथड़ा इंसान ही नहीं रह जाता पैसा, पहुँच, पद और पावर के लिए ये तथाकथित रक्षक दीन-हीन दुखियारे को ही दबोच लेते हैं ये पैसा और पहुँच वाले आदमी क़ी फटकार से डरकर किसी बेसहारा क़ी हड्डी तक को अपना निवाला बना लेते हैं

धत! है ऐसे कर्म पर... कहाँ जाती है इनकी आत्मा उस वक़्त, जब ये किसी दौलतमंद के जूते पालिश करते हैं (कहने का मतलब है उनकी चापलूसी करते हैं!) धन्य हैं ये लोग और धन्य है इनकी सोच... भारत माँ मुझे माफ़ करना क्योंकि अब मेरा आपकी मिट्टी के रंग (खाकी) से भरोसा उठ गया है... मैं उन लोगों से भी क्षमा मांगता हूँ जो 'खाकी' पर विश्वास करते हैं और उनके सहारे अपनी बीवी, अपने बच्चे और अपने परिवार क़ी सुरक्षा छोड़ देते हैं... ऐसे लोगों से मेरा निवेदन है कि "प्लीज़! होश में आईए, अन्धविश्वास को आग लगाइए!" अब से मैं भारत के उन नागरिकों क़ी श्रेणी में आ गया हूँ जो पुलिस व्यवस्था को महज़ औपचारिकता का सिस्टम मानते हैं... अब मुझे मेरे देश क़ी वर्दी और उसके अन्दर के इंसानों (शायद) पर ज़रा-सा भी यकीन नहीं रहा!

हाल ही में एक परिवार पर हुए पुलिसिया बर्ताव (निहायत बेहूदा और गैर मानवीय) ने मेरे अंतर्मन से "सत्यमेव जयते" का तख्ता ही उड़ा दिया!!!

(पूरी कहानी बताकर मैं आप लोगों के मन में "पुलिस" की छवि नहीं बिगाड़ना चाहता! )


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