हम उनकी कयादत में चलते थे चलते हैं
मौसम की तरह जो हरदम रंग बदलते हैं

वो भूल गए मेरी आँखों को दिखा सपने
यादों के दीए अक्सर तन्हाई में जलते हैं

देखेगा जहाँ एक दिन "गौतम" ये लगी दिल की
क्यों आग में जलने को परवाने मचलते हैं

उर्दू तो मोहब्बत को परवान चढ़ाती है
तासीर--असर इसके पत्थर भी पिघलते हैं

रहते हैं सदा हम तो मुश्किल की पनाहों में
अपनी है यही फितरत गिर-गिर के संभलते हैं

है अपने रक़ीबों का एहसान बड़ा हम पर
उनकी ही बदौलत तो हम मौत से लड़ते हैं

दिल तोड़ने वाले को एहसास नहीं होता
चेहरे पे खराशें हैं, आइना बदलते हैं

1 प्रतिक्रियाएँ:

ज़मीर ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना.

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