उसे मुझे सताने की आदत हो गई है
दिल मेरा दुखाने की आदत हो गई है

वो जानती है मैं उस पर मरता हूँ फिर भी
दिल मेरा जलाने की आदत हो गई है

उसे ये भी पता है मैं उसे मुस्कुराते देखना चाहता हूँ
पर मुझे देखकर उसे मुंह फिराने की आदत हो गई है

उसका ज़िक्र आते ही मैं खो सा जाता हूँ कहीं
मेरी बात आते ही उसे बातें बनाने की आदत हो गई है

वो रातों को जागती है अक़सर मुझे याद करके
मगर जागने की झूठी वज़ह बताने की आदत हो गई है

उस पर ऐतबार इतना है कि कह नहीं सकता
पर उसे मुझसे नज़रें चुराने की आदत हो गई है

वो मेरा ख़ुदा तो नहीं पर ख़ुदा से कम भी नहीं
पर उसे मुझसे दूर जाने की आदत हो गई है

"इस पर भी देखिए मेरी चाहत का आलम
मुझे उसकी इस आदत से भी मोहब्बत हो गई है"

2 प्रतिक्रियाएँ:

nilesh mathur ने कहा…

वाह! क्या बात है, बहुत सुन्दर!

kunalkishore ने कहा…

badi sundar linen likhi hain aapne,,yu hi likhte rahiye,,qki likhna likhte rehna hi kalam ka kaam hai........wah

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