आईना सामने रक्खोगे तो याद आऊंगा
अपनी
ज़ुल्फ़ों को सँवारोगे तो याद आऊंगा

रंग
कैसा हो, ये सोचोगे तो याद आऊंगा
जब
नया सूट ख़रीदोगे तो याद आऊंगा

भूल जाना मुझे आसान नहीं है इतना
जब
मुझे भूलना चाहोगे तो याद आऊंगा

ध्यान
हर हाल में जाये गा मिरी ही जानिब
तुम
जो पूजा में भी बैठोगे तो याद आऊंगा


एक
दिन भीगे थे बरसात में हम तुम दोनों
अब
जो बरसात में भीगोगे तो याद आऊंगा

चांदनी
रात में, फूलों की सुहानी रुत में
जब
कभी सैर को निकलोगे तो याद आऊंगा

जिन
में मिल जाते थे हम तुम कभी आते जाते
जब
भी उन गलियों से गुज़रोगे तो याद आऊंगा

याद आऊंगा उदासी की जो रुत आएगी
जब
कोई जश्न मनाओगे तो याद आऊंगा

शैल्फ़
में रक्खी हुई अपनी किताबों में से
कोई
दीवान उठाओगे तो याद आऊंगा

शमा की लौ पे सरे-शाम सुलगते जलते
किसी
परवाने को देखोगे तो याद आऊंगा

1 प्रतिक्रियाएँ:

kshama ने कहा…

याद आऊंगा उदासी की जो रुत आएगी
जब कोई जश्न मनाओगे तो याद आऊंगा

शैल्फ़ में रक्खी हुई अपनी किताबों में से
कोई दीवान उठाओगे तो याद आऊंगा

शमा की लौ पे सरे-शाम सुलगते जलते
किसी परवाने को देखोगे तो याद आऊंगा
Aprateem panktiyan!

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