मैं और मेरे पिता
(दुनिया में लगभग 99% लोगों की कहानी)
जब मैं 3 बरस का था, मैं सोचता था कि मेरे पिता दुनिया के सबसे मजबूत और ताकतवर व्यक्ति हैं.
जब मैं 6 बरस का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता दुनिया के सबसे मजबूत और ताकतवर ही नहीं बल्कि सबसे समझदार व्यक्ति भी हैं.
जब मैं 9 बरस का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता को दुनिया की हर चीज़ के बारे में ज्ञान हैं.
जब मैं 12 बरस का हुआ तब मैं महसूस करने लगा कि मेरे मित्रों के पिता मेरे पिता के मुकाबले ज्यादा समझदार हैं.
जब मैं 15 बरस का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता को दुनिया के साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की ज़रुरत है.
जब मैं 20 बरस का हुआ तब मुझे महसूस हुआ कि मेरे पिता किसी और ही दुनिया के हैं, वे हमारी सोच के साथ नहीं चल सकते.
जब मैं 25 बरस का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मुझे किसी भी काम के बारे में अपने पिता से सलाह नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनको हर काम में कमी निकलने की आदत सी पड़ गई है.
जब मैं 30 बरस का हुआ तब मैं महसूस करने लगा कि मेरे पिता की बुद्धि अब कमजोर पड़ने लगी है और उन्हें हमारी पीढ़ी की जरूरतों के बारे में ज्ञान नहीं हैं.
जब मैं 35 बरस का हुआ तब मैं महसूस करने लगा कि उनसे छोटी मोटी बातों पर सलाह ले लेनी चाहिए.
जब मैं 40 बरस का हुआ तब मैंने महसूस किया कि कुछ जरुरी मामलो में पिताजी से सलाह ली जा सकती है.
जब मैं 45 बरस का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता के कुछ सलाह मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं.
जब मैं 50 बरस का हुआ तब मैंने फैसला किया कि मुझे अपने पिता की सलाह के बिना कुछ भी नहीं करना चाहिए क्योंकि मुझे अब यह ज्ञान हो चुका है कि मेरे पिता दुनिया के सबसे समझदार व्यक्ति हैं पर इससे पहले कि मैं अपने इस फैसले पर अमल कर पाता मेरे पिताजी इस संसार को अलविदा कह गए और मैं पिता की हर सलाह और तजुर्बे से वंचित रह गया... मैंने वही समझा जो मुझे महसूस हुआ .. और... मैंने वही महसूस किया जिसमें मुझे आसानी हुई... आसानी से समझ में आने वाली बातों ने मुझे इस क़दर सजा दिया कि अब मैं अपना शर्मिंदगी से भराचेहरा भी नहीं देखना चाहता... काश! मैंने अपनी समझ से अधिक अपने पिता को समझा होता...

2 प्रतिक्रियाएँ:

Udan Tashtari ने कहा…

यह सभी के साथ का सत्य है....

Pankaj Kumar Sah ने कहा…

isme galt to kuchh v nahi....

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