ज़िंदगी में दो घड़ी मेरे पास न बैठा कोई
और आज सब मेरे पास बैठे जा रहे थे


कोई तोहफा न मिला आज तक मुझे "गौतम"
मगर आज सब फूल ही फूल दिए जा रहे थे

तरस गए हम किसी के हाथ से दिए एक कपड़े को
और आज नए-नए कपड़े पहनाये जा रहे थे

दो कदम साथ चलने को कोई तैयार न था
और आज काफिला बना के लिए जा रहे थे

आज मालूम हुआ कि मौत इतनी हसीन होती है
कम्बख्त हम तो यूं ही जिए जा रहे थे

4 प्रतिक्रियाएँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब ...सही है जिन्दा रहते तो किसी के पास वक्त नहीं होता दो घडी बैठने का ..

शुभम जैन ने कहा…

bahut achchi kavita...yatharth hai ye

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 21 - 06 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच-- 51 ..चर्चा मंच

prerna argal ने कहा…

bilkul jindagi ki sachchai ko batati hui dil ko choonewali rachanaa.jinda main koi nahi poochataa marane ke baad "padamshree""padambhusan" se vibhushit kar diyaa jaata hai. badhaai aapko.



please visit my blog.thanks.

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