शाम का वक़्त है शाखों को हिलाता क्यों है
तू थके-मांदे परिंदों को उड़ाता क्यों है

वक़्त को कौन भला रोक सका है पगले
सुइयां घड़ियों की तू पीछे घुमाता क्यों है

स्वाद कैसा है पसीने का ये मजदूर से पूछ
छाँव में बैठकर अंदाज़ लगता क्यों है

मुझको सीने से लगाने में है तौहीन अगर
दोस्ती के लिए फिर हाथ बढ़ाता क्यों है

प्यार के रूप हैं सब त्याग-तपस्या-पूजा
इनमे अंतर का कोई प्रश्न उठाता क्यों है

मुस्कुराना है मेरे होंठों की आदत में शुमार
इसका मतलब मेरे सुख-दुःख से लगाता क्यों है

8 प्रतिक्रियाएँ:

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बहुत बढ़िया जी बहुत बढ़िया.

vandana ने कहा…

प्रत्येक शेर बार बार पढ़ने लायक ...साधुवाद

udaya veer singh ने कहा…

thanks for your intuition &humanitarian based thoughts. Realistic creation ../

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत गज़ल ..हर आशारा अपने में अलग बात करता हुआ

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

मुझको सीने से लगाने में है तौहीन अगर
दोस्ती के लिए फिर हाथ बढ़ाता क्यों है

प्यार के रूप हैं सब त्याग-तपस्या-पूजा
इनमे अंतर का कोई प्रश्न उठाता क्यों है

More than Excellent.

अजय कुमार ने कहा…

स्वाद कैसा है पसीने का ये मजदूर से पूछ
छाँव में बैठकर अंदाज़ लगता क्यों है

बहुत खूबसूरत संदेश ,बधाई

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वक़्त को कौन भला रोक सका है पगले
सुइयां घड़ियों की तू पीछे घुमाता क्यों है ..


सुभान अल्ला .. क्या ग़ज़ब के शेर निकाले हैं ... बहुत ही उम्दा ... हर शेर लाजवाब ...

M VERMA ने कहा…

स्वाद कैसा है पसीने का ये मजदूर से पूछ
छाँव में बैठकर अंदाज़ लगता क्यों है

बहुत सुन्दर

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