सोचा नहीं अच्छा बुरा
देखा सुना कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से हर वक़्त
तेरे सिवा कुछ भी नहीं

देखा तुझे चाहा तुझे
सोचा तुझे पूजा तुझे
मेरी वफ़ा मेरी ख़ता
तेरी ख़ता कुछ भी नहीं

जिस पर हमारी आँख ने
मोती बिछाए रात भर
भेजा वही कागज़ उसे
उसमें लिखा कुछ भी नहीं

एक शाम की दहलीज़ पर
बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत
मुंह से कहा कुछ भी नहीं

दो चार दिन की बात है
दिल खाक़ में मिल जाएगा
आग पर जब कागज़ रखा
बाक़ी बचा कुछ भी नहीं

2 प्रतिक्रियाएँ:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह बहुत खूब!!!

kshama ने कहा…

जिस पर हमारी आँख ने
मोती बिछाए रात भर
भेजा वही कागज़ उसे
उसमें लिखा कुछ भी नहीं
Bahut khoob!

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