यूं न मिल मुझसे ख़फ़ा हो जैसे
साथ चल मौज-ऐ-सबा हो जैसे

लोग यूं देख के हंस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूं न मिल हमसे खुदा हो जैसे

मौत भी आएगी तो इस नाज़ के साथ
मुझ पे एहसान किया हो जैसे

ऐसे अनजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे

हिचकियाँ रात को आती हैं बहुत
तूने फिर याद किया हो जैसे

ज़िन्दगी बीत रही अब "गौतम"
एक बेज़ुर्म सज़ा हो जैसे...

3 प्रतिक्रियाएँ:

वन्दना ने कहा…

उफ़ ……………बहुत शानदार गज़ल्।

संगीता पुरी ने कहा…

वाह ..

सुदीप मिर्ज़ा ने कहा…

क्या बात है ....

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