मोहब्बत खुद बताती है
कहाँ किसका ठिकाना है
किसे आँखों में रखना है
किसे दिल में बसाना है

रिहा करना है किसको और
किसे ज़ंजीर करना है
मिटाना है किसे दिल से
किसे तहरीर करना है

इसे मालूम होता है
सफ़र दुश्वार कितना है

किसी की चश्म-ऐ-गैरां में
छिपा इक़रार कितना है
शज़र जो गिरने वाला है
वो सायादार कितना है

2 प्रतिक्रियाएँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति ... अंत में लगा कि कुछ और आगे लिखा जाना चाहिए था ..

संध्या शर्मा ने कहा…

अच्छी रचना... नव वर्ष की हार्दिक शुभकमनाएं...

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